Breaking News
Home / Study Material / SSC CGL DESCRIPTIVE BOOSTER for SSC CGL 17- Part 1 (Hindi)

SSC CGL DESCRIPTIVE BOOSTER for SSC CGL 17- Part 1 (Hindi)

right to privacy

निजता का अधिकार

भारतीय संविधान ने अपने नागरिकों को कई प्रकार के मौलिक अधिकार दे रखे हैं। लेकिन शत-प्रतिशत इन्हें लागू नहीं किया जाता है। वर्तमान में निजता के अधिकार को लेकर चल रही चर्चाओं के लिए भी नागरिकों के मन में यही शंका व्याप्त है कि क्या इसे मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जा सकेगा? अगर ऐसा होता है, तो क्या इसे शत-प्रतिशत लागू किया जा सकेगा। ऐसा मौलिक अधिकार मिलने के बाद क्या नागरिक सरकार की निगरानी से बच सकेंगे? ऐसे अनेक प्रश्न लोगों के मन में हैं।

दरअसल निजता के अधिकार का वर्णन संविधान में नहीं किया गया है। परन्तु अगर केवल संविधान के आधार पर ही निजता के अधिकार को देखा जाना है, तो मनमानी करने के विरूद्ध अधिकार एवं प्रेस की स्वतंत्रता जैसे विषय भी समाप्त हो जाने चाहिए। किसी निजी संस्था को अपनी मर्जी से अपने बारे में सूचना देने और सरकार द्वारा नागरिकों को सूचनाएं प्रदान करने की अनिवार्यता में अंतर है। अतः निजता के अधिकार के बारे में निर्णय लेने के लिए स्वयं एपेक्स कोर्ट को भी अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा।

क्या हमारा न्यायालय आज सूचना तंत्र के युग में 1963 और 1973 जैसा सशक्त निर्णय ले सकेगा, जब उसने इंदिरा गांधी सरकार को संविधान में संशोधन करने से रोक दिया था? सन् 1954 के सतीश चंद्र मामले में न्यायालय ने अनुच्छेद 20 (3) के अंतर्गत निजता के अधिकार के प्रावधान को ठुकरा दिया था। कहीं 1963 में खड़क सिंह के मामले में न्यायालय ने इसे स्वीकार किया था। परन्तु फिर भी एक संक्षिप्त चर्चा के बाद न्यायालय ने यही कहा था कि भारत में निजता का कोई अधिकार नहीं है। दूसरी ओर, न्यायाधीश सुब्बाराव ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का एक महत्वपूर्ण अंग माना था।

निजता का अधिकार दिए जाने के बाद भी सरकार अपने नागरिकों पर कुछ अंकुश लगा सकेगी। निजता के अधिकार का अर्थ इस मामले में पूर्ण अधिकार मिलने से न लगाया जाए। विश्व के धरातल पर इस संदर्भ को देखें, तो पाते हैं कि निजता केअधिकार को खत्म करके न तो राष्ट्रीय सुरक्षा बढ़ाई जा सकी है और न ही आतंकवाद को खत्म किया जा सका है। इससे केवल नागरिकों के व्यक्तिगत निर्णय ले सकने के अधिकार का ही हनन हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया है। नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मती से निजता के अधिकार पर यह फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि निजता एक मौलिक अधिकार है।
निजता राइट टू लाइफ का हिस्‍सा है। निजता के हनन करने वाले कानून गलत हैं। कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है और यह संविधान के आर्टिकल 21 (जीने के अधिकार) के तहत आता है। मामले में बहस के बाद कोर्ट ने गत दो अगस्त को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब पांच न्यायाधीशों की पीठ आधार की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।

क्या है ?

1.निजता के अधिकार पर बहस इसलिए शुरू हुई, क्योंकि आधार योजना को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की दलील है कि बायोमीट्रिक डाटा और सूचनाएं एकत्र करने से उनके निजता के अधिकार का हनन होता है।
2.सुप्रीम कोर्ट के दो पूर्व फैसलों में आठ न्यायाधीशों और छह न्यायाधीशों की पीठ कह चुकी है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। ऐसे में भारत सरकार और याचिकाकर्ताओं ने निजता के अधिकार का मुद्दा बड़ी पीठ के द्वारा सुने जाने की अपील की थी। इस पर नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ गठित हुई।
3.पीठ के अध्यक्ष प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर हैं। उनके अलावा पीठ में जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल, जस्टिस एएम सप्रे और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं।
विरोध में सरकार की दलीलें
1.ये सन्निहित अधिकार है, लेकिन ये कॉमन लॉ में आता है।
2.निजता हर मामले की परिस्थितियों पर तय होती है।
3.संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर इसे मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं किया था।
4.कोर्ट मौलिक अधिकार घोषित करता है, तो यह संविधान संशोधन होगा जिसका कोर्ट को अधिकार नहीं है।
5.आंकड़े एकत्रित करना निजता के तहत नहीं आता।
6.निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया, तो तकनीक का सहारा लेकर गुड गर्वनेंस के प्रयास रुक जाएंगे।
समर्थन में याचिकाकर्ताओं की दलीलें
1.निजता सम्मान से जीवन जीने के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
2.मुख्य अधिकार मौलिक अधिकार है, तो उसका हिस्सा भी माना जाएगा।
3.कोर्ट कई फैसलों में निजता के अधिकार को मान्यता दे चुका है।
4.निजता को स्वतंत्रता व जीवन के अधिकार से अलग करके नहीं देख सकते।
5.अमेरिका और अन्य देशों में निजता को मौलिक अधिकार माना गया है।

पृष्ठभूमि

1.आज़ादी से पहले भी राइट टू प्राइवेसी की वकालत ज़ोरदार ढंग से होती रही है। 1895 में लाए गए भारतीय संविधान बिल में भी राइट टू प्राइवेसी की वकालत सशक्त तरीके से की गई थी। इस बिल में कहा गया था कि हर व्यक्ति का घर उसकी शरणस्थली होता है और सरकार बिना किसी ठोस कारण और क़ानूनी अनुमति के उसे भेद नहीं सकती।
2.इसके बाद 1925 में महात्मा गांधी की सदस्यता वाली समिति ने ‘कामनवेल्थ ऑफ इंडिया बिल’ को बनाते हुए भी राइट टू प्राइवेसी का उल्लेखी किया था।
3.मार्च 1947 में भी भीमराव आंबेडकर ने राइट टू प्राइवेसी के विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा था कि लोगों को अपनी निजता का अधिकार है।
4.इस अधिकार के उल्लंघन को रोकने के लिए कड़े मापदंड तय करने की जरूरत थी। मगर उनका यह भी कहना था कि अगर किसी कारणवश उसे भेदना सरकार के लिए ज़रूरी हो तो सबकुछ न्यायलय की कड़ी देख रेख में होना चाहिए।

घटनाक्रम

सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रत्येक नागरिक को प्रभावित करने वाले अपने आज के ऐतिहासिक फैसले में निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया।निजता के अधिकार मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का घटनाक्रम।

सात जुलाई 2017 :– तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि आधार को लेकर उठ रहे मुद्दों पर अंतिम व्यवस्था बड़ी पीठ देगी और संविधान पीठ के गठन की जरुरत पर निर्णय भारत के प्रधान न्यायाधीश करेंगे।

सात जुलाई :- मामला प्रधान न्यायाधीश के समक्ष उठाया गया, सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन।

18 जुलाई:- पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित करने के संबंध में फैसले के लिए नौ न्यायाधीशों की पीठ के गठन का फैसला लिया।

नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ (प्रधान न्यायाधीश जे. एस. खेहर, न्यायमूर्ति जे. चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति एस. ए. बोबडे, न्यायमूर्ति आर. के. अग्रवाल, न्यायमूर्ति आर. एफ. नरीमन, न्यायमूर्ति ए. एम. सप्रे, न्यायमूर्ति डी. वाई. चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर) निजता के मामले की सुनवाई करेंगे।

19 जुलाई:- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार पूर्ण नहीं हो सकता, नियमन किया जा सकता है।

19 जुलाई:- केंद्र ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है।

26 जुलाई :- कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, पंजाब और पुडुचेरी, गैर-भाजपा शासित चार राज्य निजता के अधिकार के पक्ष में न्यायालय पहुंचे।

26 जुलाई :- केंद्र ने न्यायालय से कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार हो सकता है, लेकिन कुछ अपवादों शर्तों के साथ।

27 जुलाई:– महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि निजता का अधिकार कोई ‘इकलौती’ चीज नहीं है, यह व्यापक विचार है।

एक अगस्त:- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक मंच पर व्यक्ति की निजी सूचनाओं की सुरक्षा के लिए ‘ ‘विस्तृत ‘ ‘ दिशा-निर्देश होने चाहिए।

दो अगस्त:- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रौद्योगिकी के दौर में निजता की सुरक्षा का सिद्धांत एक ‘ ‘हारी हुई लड़ाई ‘ ‘ है, फैसला सुरक्षित रखा।

24 अगस्त:- सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को भारत के संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया।

India's No. 1 SSC Test Series for SSC CGL/CPO/CHSL - Click Here
SSCtube Online Test Series

Check Also

Daily Dose by SSCtube – Trigonometry (17-11-2018)

Daily Dose by SSCtube (Trigonometry) Attempt SSC CGL 18/CPO 18/RRB ALP/RRB GROUP D Free Live …

Daily Dose by SSCtube – Cloze Test (16-11-2018)

Daily Dose by SSCtube (Cloze Test) Attempt SSC CGL 18/CPO 18/RRB ALP/RRB GROUP D Free …

Daily Dose by SSCtube – Error Detection (15.11.2018)

Daily Dose by SSCtube (Error Detection) Attempt SSC CGL 18/CPO 18/RRB ALP/RRB GROUP D Free …

Leave a Reply

Your email address will not be published.